भारतीय ऋषि-मुनियों ने लोक-कल्याण के लिए अनेक चमत्कारिक शास्त्र रचे, जिनमें स्वर-शास्त्र प्रमुख है। यह विद्या सुख, सौभाग्य, सफलता, स्वास्थ्य और दीर्घायु प्रदान करती है।
स्वर + उदय = स्वरोदय, अर्थात नासिका से निकलने वाली वायु की गति से शुभ-अशुभ और भविष्य का ज्ञान प्राप्त करना। यह प्राचीन विज्ञान आज दुर्लभ है, पर इसके ज्ञाता सदैव सुखी और सफल रहते हैं। स्वर-विज्ञान न केवल भविष्य बताता है, बल्कि शरीर की आरोग्यता बनाए रखने में भी अत्यंत उपयोगी है।
स्वर-विज्ञान’ वह ज्ञान है जो नासिका से निकलने वाली वायु की दिशा, गति और उसके प्रभाव को समझने की विद्या सिखाता है।
स्वर अभ्यास के माध्यम से मनुष्य अपनी छिपी हुई शक्तियों को जाग्रत कर सकता है और प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित कर सकता है। वास्तव में वही व्यक्ति जीवन में सफल होता है जो प्रकृति के अनुरूप चलता है, क्योंकि प्रकृति के विपरीत चलने पर असफलता निश्चित होती है। स्वर-विज्ञान मनुष्य को प्रकृति से जोड़ने का एक सहज और दिव्य मार्ग है।
साधक को चाहिए कि वह शांत मन से एकांत में बैठकर अपने गुरु और इष्ट देव का स्मरण करे, फिर नासिका से निकलने वाले स्वर का निरीक्षण करे। यदि वह शास्त्र में बताए अनुसार कार्य करे तो स्वर की अनुकूलता से उसे सफलता और शुभ फल प्राप्त होते हैं। यह विद्या अत्यंत पवित्र और कल्याणकारी है, जिससे जीवन और परलोक दोनों सुधरते हैं।
शास्त्रों में स्वर-विज्ञान की महिमा का वर्णन करते हुए कहा गया है कि स्वरों की अनुकूलता से भगवान राम ने रावण जैसे शक्तिशाली राक्षस का वध किया, और स्वरों की प्रतिकूलता के कारण रावण जैसे अपराजेय योद्धा का पतन हुआ। पांडवों ने स्वरों के अनुरूप कार्य कर विजय प्राप्त की, जबकि कौरव स्वरों की विपरीतता से पराजित हुए।
वास्तव में मानव शरीर में मेरुदंड के दोनों ओर दो प्रमुख नाड़ियाँ होती हैं बाईं ओर की इड़ा नाड़ी, जिसमें चंद्र ऊर्जा का वास है (शीतल स्वभाव), और दाहिनी ओर की पिंगला नाड़ी, जिसमें सूर्य ऊर्जा का वास है (उष्ण स्वभाव)।
इड़ा बाँई नासिका से और पिंगला दाहिनी नासिका से चलती है। ये नाड़ियाँ लगभग हर ढाई घड़ी (लगभग एक घंटे) में परिवर्तन करती रहती हैं। इन्हीं नाड़ियों के प्रभाव से स्वर बदलते हैं और उसी के अनुसार मनुष्य के कार्य शुभ या अशुभ होते हैं।
मानव शरीर की नाड़ियों में सुषुम्णा नाड़ी सबसे महत्वपूर्ण है। यही मोक्ष का मार्ग और ब्रह्मांड की आधार रेखा मानी गई है। यह गुदा के पीछे से शुरू होकर मेरुदंड के साथ ऊपर ब्रह्मरंध्र तक जाती है। इसके दाहिनी ओर पिंगला (सूर्य नाड़ी) और बाँई ओर इड़ा (चंद्र नाड़ी) होती हैं।
जब सुषुम्णा जाग्रत होती है, तब योगी की साधना सफल होती है उसे समाधि लगने लगती है और वह सांसारिक मोह से मुक्त होता है।
इसी नाड़ी से कुण्डलिनी शक्ति ऊपर उठकर षट्चक्रों का भेदन करती है, जिससे अद्भुत शक्तियाँ और दिव्य आनंद की अनुभूति होती है।
सुषुम्णा को ब्रह्मनाड़ी भी कहा जाता है; इसमें प्राण प्रवाहित करने से योगी शीघ्र सिद्धि और मुक्ति प्राप्त करता है।
गुह्य स्थान से दो अंगुल ऊपर और लिंग मूल से नीचे चार अंगुल तक का भाग मूलाधार चक्र कहलाता है। यहीं ब्रह्मनाड़ी के मुख में स्वयम्भू लिंग स्थित है, जिसके चारों ओर साढ़े तीन फेरे में कुण्डलिनी शक्ति सर्पाकार रूप में कुण्डली मारे रहती है।
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