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नाना पाटेकर...

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हिंदी सिनेमा में अगर किसी अभिनेता को अभिनय का पर्याय कहा जाए, तो नाना पाटेकर का नाम खुद-ब-खुद सामने आ जाता है। 75 साल की उम्र में भी उनकी आवाज़, आंखों की आग और संवादों की धार वैसी ही है, जैसी दशकों पहले थी। लेकिन नाना की असली कहानी सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं है। उनकी जिंदगी के फैसले, संघर्ष, सादगी और सोच उन्हें भीड़ से बिल्कुल अलग खड़ा करती है। उनका जन्म 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के मुरुड-जंजीरा में हुआ। एक छोटे से कस्बे से निकलकर नेशनल अवॉर्ड और पद्मश्री तक पहुंचने वाला यह सफर आसान नहीं था, बल्कि दर्द, त्याग और आत्मसंघर्ष से भरा हुआ था।


सिर्फ 750 रुपये में शादी, जब कमाई थी 50 रुपये...

आज जहां सितारे करोड़ों की शादियों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा करते हैं, वहीं नाना पाटेकर की शादी सादगी की मिसाल बन गई। साल 1978 में नाना ने नीलकांति पाटेकर से विवाह किया, जब वे थिएटर में काम करते थे और प्रति शो केवल 50 रुपये कमाते थे। अगर महीने में 15 शो हो जाते, तो कुल कमाई 750 रुपये होती थी। नीलकांति उस वक्त बैंक में अफसर थीं और 2500 रुपये महीना कमाती थीं। दोनों की कुल आमदनी 3250 रुपये थी, जिसे वे उस दौर में काफी मानते थे। शादी पर कुल खर्च 750 रुपये हुआ और बचे हुए 24 रुपये से गोल्ड स्पॉट खरीदकर मेहमानों को पिलाया गया। यह किस्सा आज भी बताता है कि नाना के लिए रिश्तों की कीमत पैसे से कहीं ज्यादा रही है।


थिएटर, जहां नीलकांति से मिली जिंदगी की साथी...

फिल्मों में आने से पहले नाना पाटेकर थिएटर का जाना-पहचाना नाम थे। उसी दौरान उनकी मुलाकात नीलकांति से हुई, जो एक्ट्रेस होने के साथ-साथ लेखिका भी थीं। नाना हमेशा कहते हैं कि थिएटर ने उन्हें अनुशासन सिखाया और जिंदगी को देखने का नजरिया दिया। वहीं मंच पर उन्होंने सीखा कि अभिनय सिर्फ कला नहीं, जिम्मेदारी भी है। यही सोच बाद में उनके फिल्मी किरदारों में भी दिखाई दी।


पिता की अर्थी और मंच की जिम्मेदारी...

नाना पाटेकर के जीवन का सबसे मार्मिक किस्सा तब सामने आता है, जब उनके पिता का निधन हुआ और उसी दिन उनके नाटक के शो थे। शो रद्द करने की बात हुई, लेकिन नाना ने दर्शकों को अपने दुख में शामिल न करने का फैसला किया। पिता की मृत्यु के बाद भी उन्होंने मंच पर अभिनय किया। दो शोज के बीच अंतिम संस्कार किया और फिर वापस आकर नाटक पूरा किया। उनके शब्द आज भी चुभते हैं कि वे अपने आंसू कैमरे के सामने बेचते हैं और असली जिंदगी में खुद को मजबूत रखते हैं। यह सिर्फ एक अभिनेता का नहीं, बल्कि एक जुझारू इंसान का बयान है।


अलग रहते हुए भी अधूरा रिश्ता नहीं...

शादी के बाद नाना और नीलकांति दो बेटों के माता-पिता बने। दुर्भाग्य से एक बेटे का निधन हो गया। आज नाना और नीलकांति साथ नहीं रहते, लेकिन उन्होंने कभी तलाक नहीं लिया। दोनों अपने-अपने तरीके से जिंदगी जी रहे हैं। यह रिश्ता टूटकर भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ, बल्कि खामोशी में टिके रहने की मिसाल बन गया।


अकेलापन, जो हर अभिनेता का सच है...

नाना पाटेकर मानते हैं कि स्टारडम अस्थायी है और हर अभिनेता अंत में अकेला होता है। उन्होंने राजेश खन्ना के उदाहरण से यह बात कही कि शोहरत ढलने के बाद इंसान कैसे खुद से जूझता है। नाना कहते हैं कि अभिनेता अपने किरदारों के दुख-सुख में इतने उलझ जाते हैं कि अपने निजी जीवन को नजरअंदाज कर देते हैं। जब होश आता है, तब तक तालियां खामोश हो चुकी होती हैं।


समंदर, कविताएं और खुद से बातचीत...

नाना का रिश्ता समंदर से बेहद निजी है। गोवा में समंदर किनारे बैठकर लिखी गई उनकी कविताएं, उनकी तन्हाई की साथी हैं। उनके कई मशहूर डायलॉग, जैसे ‘एक मच्छर आदमी को हिजड़ा बना देता है’, उनके खुद के लिखे हुए हैं। उनका कहना है कि घर में अगर छह लोग हैं, तो वो चार दीवारें, छत और वे खुद हैं। यही उनका सुकून है।


विवाद, गुस्सा और ईमानदार...

नाना पाटेकर का गुस्सा उतना ही मशहूर है, जितनी उनकी एक्टिंग। डायरेक्टर्स से बहस, सेट पर टकराव और साफ बोलने की आदत उन्हें अलग बनाती है। लेकिन वे खुद मानते हैं कि ईमानदारी उनकी सबसे बड़ी ताकत है। अनीस बज्मी जैसे निर्देशकों के साथ उनके झगड़े भी इसी ईमानदारी से जुड़े हैं। वे समझौता नहीं करते, चाहे कीमत कुछ भी हो।


अंडरवर्ल्ड से दूरी, मां की वजह से...

नाना ने खुद स्वीकार किया है कि अगर वे फिल्मों में नहीं आते, तो शायद गलत रास्ते पर चले जाते। उनका रिश्ता कुख्यात गैंगस्टर मन्या सुर्वे से था, जो उनके मामा के बेटे थे। उनकी मां ने जानबूझकर बच्चों को मुंबई से दूर मुरुड-जंजीरा में पाला, ताकि वे अपराध की दुनिया से बच सकें। नाना मानते हैं कि मां का यह फैसला उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट था।


दोस्ती में अमीर, जिंदगी में सादा...

नाना पाटेकर कहते हैं कि वे पैसे से नहीं, दोस्तों से अमीर हैं। पुराने दोस्त आज भी उनके साथ हैं। दोस्त की मदद के लिए घर गिरवी रखना उनके स्वभाव का हिस्सा है। उन्हें मुंबई की चकाचौंध नहीं भाती। गांव, खेत और सादगी में ही उन्हें सुकून मिलता है।


नाना पाटेकर की कहानी सिर्फ एक अभिनेता की नहीं, बल्कि उस इंसान की है जिसने हालातों से लड़कर अपनी राह बनाई। पर्दे पर गुस्सैल और बाहर बेहद संवेदनशील यह शख्स आज भी उतना ही रहस्यमयी है, जितना उसकी फिल्मों के किरदार।

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