भारतीय संगीत जगत में मंगेशकर परिवार का नाम लेते ही सबसे पहले स्वर कोकिला लता मंगेशकर का चेहरा सामने आता है, लेकिन बहुत कम लोग उस मजबूत नींव को याद करते हैं, जिस पर यह पूरी सुरों की इमारत खड़ी हुई। उस नींव का नाम है पंडित दीनानाथ मंगेशकर। आज उनकी जयंती पर यह जरूरी हो जाता है कि हम सिर्फ लता दीदी के पिता के रूप में नहीं, बल्कि एक महान गायक, प्रभावशाली रंगमंच कलाकार, नाटककार और संगीत साधक के रूप में उन्हें याद करें। दीनानाथ मंगेशकर वह व्यक्ति थे, जिनके जीवन की साधना, संघर्ष और कला ने आने वाली पीढ़ियों को सुरों की दिशा दी।
मंगेशी गांव से संगीत की शुरुआत...
29 दिसंबर 1900 को गोवा के मंगेशी गांव में जन्मे दीनानाथ मंगेशकर के जीवन में संगीत कोई संयोग नहीं था, बल्कि परंपरा थी। उनके पिता गणेश भट्ट हार्डीकर मंदिर के पुजारी थे और मां येसुबाई मंदिर में भजन गाया करती थीं। मां की गोद में बैठे-बैठे भजनों की धुन सुनना ही दीनानाथ का पहला संगीत पाठ था। बाद में उन्होंने अपने गांव मंगेशी के नाम पर अपना उपनाम मंगेशकर रख लिया, जो आगे चलकर भारतीय संगीत के इतिहास में अमर हो गया। बहुत कम उम्र में ही यह साफ हो गया था कि यह बच्चा सामान्य नहीं है, क्योंकि सुर और लय की समझ उसमें असाधारण थी।
पांच साल की उम्र में शुरू हुई साधना...
महज पांच साल की उम्र में दीनानाथ मंगेशकर ने संगीत की विधिवत शिक्षा लेना शुरू कर दिया था। इतनी कम उम्र में रागों की पकड़ और आवाज़ की स्पष्टता लोगों को हैरान कर देती थी। उन्होंने बाबा माशेलकर, पंडित रामकृष्ण बुआ वजे और पंडित सुखदेव प्रसाद जैसे महान गुरुओं से संगीत सीखा। यह सीख सिर्फ रियाज़ तक सीमित नहीं थी, बल्कि संगीत को जीने की प्रक्रिया थी। दीनानाथ के लिए सुर साधना नहीं, सांसों का हिस्सा बन चुके थे, और यही वजह थी कि उनकी गायकी में ताकत भी थी और भावनाओं की गहराई भी।
मराठी रंगमंच का चमकता सितारा...
कम उम्र में ही दीनानाथ मंगेशकर का झुकाव मराठी रंगमंच की ओर हो गया। उन्होंने किर्लोस्कर नाटक मंडली में काम शुरू किया और बहुत जल्द अपने अभिनय और गायन से अलग पहचान बना ली। उस दौर में पुरुष कलाकारों द्वारा महिला भूमिकाएं निभाना आम बात थी और दीनानाथ ने उर्दू और हिंदी नाटकों में भी महिला पात्रों को इतनी प्रभावशाली ढंग से निभाया कि दर्शक मंत्रमुग्ध हो जाते थे। मंच पर उनकी मौजूदगी, दमदार आवाज़ और भावपूर्ण गायन उन्हें अपने समय का बड़ा कलाकार बना चुका था।
अपनी नाटक मंडली और संगीत नाटकों का दौर...
1918 में दीनानाथ मंगेशकर ने बलवंत संगीत नाटक मंडली की स्थापना की। यही वह दौर था, जब उन्होंने मराठी संगीत नाटक को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। राजसंन्यास, रणदुंदुभि और भावबंधन जैसे नाटकों में उनका गायन दर्शकों के दिलों में उतर जाता था। खास बात यह थी कि वह मंच पर सिर्फ कलाकार नहीं होते थे, बल्कि हर किरदार को पूरी आत्मा से जीते थे। उनके नाटक देखने वाले लोग सिर्फ कहानी नहीं, बल्कि संगीत की शक्ति महसूस करते थे।
सिनेमा की दुनिया में भी रखा कदम...
रंगमंच के साथ-साथ दीनानाथ मंगेशकर ने सिनेमा की दुनिया में भी अपनी छाप छोड़ी। 1930 के दशक में उन्होंने तीन फिल्मों का निर्माण किया, जिनमें सबसे चर्चित फिल्म ‘कृष्णार्जुन युद्ध’ रही। यह फिल्म हिंदी और मराठी दोनों भाषाओं में बनी थी। इसमें दीनानाथ ने अभिनय भी किया और गीत भी गाया, जो उन्हीं पर फिल्माया गया था। यह उस दौर में बहुत बड़ी बात थी, जब रंगमंच से सिनेमा तक का सफर आसान नहीं था।
निजी जीवन और संगीत से भरा परिवार...
दीनानाथ मंगेशकर का निजी जीवन भी उतना ही दिलचस्प रहा। उन्होंने 1922 में गुजरात के थालनेर गांव के प्रसिद्ध जमींदार हरिदास की बेटी नर्मदाबेन से विवाह किया, लेकिन शादी के चार साल बाद बीमारी के चलते उनका निधन हो गया। इसके बाद दीनानाथ ने नर्मदाबेन की बहन साधुमती से विवाह किया। इसी विवाह से उन्हें पांच संतानें मिलीं, चार बेटियां लता, मीना, आशा और उषा, और एक बेटा हृदयनाथ। यह कहना गलत नहीं होगा कि भारतीय संगीत को एक साथ इतने प्रतिभाशाली कलाकार शायद ही किसी एक परिवार से मिले हों।
जब पिता बने गुरु और इतिहास बदल गया...
दिलचस्प बात यह है कि लता मंगेशकर का जन्म नाम हेमा था, जिसे दीनानाथ ने अपने नाटक भावबंधन के पात्र से प्रेरित होकर बदलकर लता रखा। दीनानाथ को शुरू में यह भी अंदाज़ा नहीं था कि उनकी बेटी में इतनी बड़ी संगीत प्रतिभा छिपी है। लेकिन जिस दिन आंगन में खेलती लता ने कठिन राग को सहजता से गाकर सुना दिया, उस दिन एक पिता नहीं, बल्कि एक गुरु चौंक गया। वही पल भारतीय संगीत के इतिहास का टर्निंग पॉइंट बन गया।
असमय विदाई और अधूरी साधना...
1942 में महज 41 वर्ष की उम्र में पंडित दीनानाथ मंगेशकर का निधन हो गया। उस समय लता सिर्फ 13 साल की थीं। पिता के जाने के बाद परिवार की जिम्मेदारी लता के कंधों पर आ गई, लेकिन यह भी सच है कि दीनानाथ अपनी संतानों को वह संस्कार दे चुके थे, जिसने उन्हें कभी टूटने नहीं दिया।
आज दीनानाथ मंगेशकर की जयंती पर उन्हें याद करना सिर्फ एक कलाकार को श्रद्धांजलि देना नहीं है, बल्कि उस व्यक्ति को नमन करना है, जिसने सुरों की ऐसी विरासत छोड़ी, जो आज भी भारतीय संगीत की पहचान बनी हुई है।
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